मैं दृष्टा हूँ - रवि सिंघल

देखता हूँ गगन, सुमन और समुंदर की तरुणाई को,

प्रति पल धीमी होती हुई इस समय की अरुणाई को।

दु:ख के रक्त कणोंसे लतपथ जीवन के अवसाद को,

या सुख के प्यालों से छके हुए मन के अंतर्नाद को।



शीत उष्ण और वर्षा पतझड़ ऋतुएं आती जाती हैं,

इस शरीर और मन के द्वारों पर दस्तक दे जाती हैं।

मिलना और बिछोह हृदय के तारो को सहलाता है,

इस जीवन का मायाजाल शरीर को बांधे जाता है।



पर मैं लिप्त नहीं, मैं भुक्त नहीं,

अतृप्त नहीं, आसक्त नहीं।

ये समग्र विलास है जग मेरा,

पर मैं करण नहीं मैं संज्ञा नहीं।



मैं तो केवल दृष्टा हूँ,

बिन आँखों के, बिन साँसों के।

देख रहा हूँ हो विस्मित,

जिस सृष्टि का मैं सृष्टा हूँ।